"हमारे गुरु मास्टर हरपाल जी को प्रणाम. जीवन-संगिनी की मौत से ज्यादा इस उम्र में कोई चोट नहीं हो सकती. मैं ज्वार-भाटा के बीच फंसा हुआ अपने मन के भावों और घावों को चाह कर भी आज इस घडी में रोक नहीं पा रहा हूँ. आपके स्नेह और आशीर्वाद ने जो जोत जगाई है, उसके लिए मेरे उद्गार अच्छे लगें तो मेरा दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल जायेगा.
आध-अधूरा पढ़-लिख, गाँव की इस माटी का सौरभ पाया,
अरमानों भी खूब हुआ,
वैर-विरोध कर, जीवन की जोत जलाई है,
पैदा हुए नपैद, ऐसा पुरखों से सुनता आया हूँ.
जीवन में लगा धर्मदेवी का संग, गृहस्थी आबाद हुई,
दो बच्चों का पाया संग, बचपन में मां को खोया
पिता का साया साथ हुआ,
पैदा हुए नपैद, ऐसा पुरखों से सुनता आया हूँ.
विघ्न-बाधाओं की जंग में त्याग-तपस्या हुई भंग,
अपनों के बीच व्यथा का चेहरा सजाया है,
भरा नहीं घावों से, भावों का भी आभाव हुआ,
पैदा हुए नपैद, ऐसा पुरखों से सुनता आया हूँ.
खूब मिली प्रतिष्ठा जग में,
अंधी हुई उसके आगे संसारी माया,
बड़े-बड़े लोगों का स्नेह पाया, संभल न उसको मैं पाया
पैदा हुए नपैद, ऐसा पुरखों से सुनता आया हूँ.
अपनों के मन में खूब उतरा, परायों में अपनापन पाया,
गति हुई इतनी कि मजबूती से चल न पाया,
हेराफेरी को अपना दुश्मन खूब बनाया,
पैदा हुए नपैद, ऐसा पुरखों से सुनता आया हूँ.
सुख-दुःख कि इस मतलबी दुनिया में,
जीवन तपता है, अस्थि जलती है,
अपनों के बीच परायों को मीत पाया
पैदा हुए नपैद, ऐसा पुरखों से सुनता आया हूँ.
मेरे मन की अनकही व्यथा बहुतों ने नहीं समझी,
क्यूंकि संसार में परमार्थी कम, स्वार्थी ज्यादा,
खुदगर्जी में चलती है संसारी मर्जी,
उधो तेरा भी जीवन साकार नहीं हुआ; पैदा हुए नपैद, ऐसा पुरखों से सुनता आया हूँ।
(गंगा जीवन से लेखा मृत्यु तक साथ है, पेश है गंगा जी को)
गंगा तू इतनी पवन है, हिंद यही जयहिंद यही; देश-समाज का कुछ ख्याल करो, मिसाल नहीं तो मशाल बनो; के राजेंद्र 'बेबस', कुछ ऐसा कर जाओ जगत में, मरकर भी अमर कहाओ,
पैदा हुए नपैद, ऐसा पुरखों से सुनता आया हूँ.
मेरा वंदन, आपका अभिनन्दन, मानो-न-मानो आप मेरे सर का चन्दन. आपके प्रति धन्यवाद बहुत छोटा है। मैं आप सबका कर्जदार हूँ. जयहिंद.
शनिवार, 22 अक्टूबर 2011
मंगलवार, 13 सितंबर 2011
सृष्टि के आरम्भ से ही मानव-विचारों का आदान-प्रदान अभिव्यक्ति से होता है. अभिव्यक्ति को प्रकट करने का सबसे प्रबल और असरकारी रूप कोई भी 'भाषा' नहीं बल्कि मात्र 'मातृभाषा' होती है. इतिहास हमें बारम्बार झकझोरता है कि हमारे देश ने गुलामी झेली, उसके जंजीरें एक लम्बे संघर्ष और हमारे पूर्वजों के अनगिनत त्याग और बालिदानों के बाद कटी, लेकिन गंभीरता से सोचने का क्या अब तक उचित समय नहीं आया है कि हम आजादी के छः दशक बीत जाने पर आज भी 'अंग्रेजी' गुलामी का जो कलंक 'ढ़ो' रहे हैं, क्या उसे 'ढ़ोने' की बजाय 'धोने' की जरूरत नहीं है? मातृभाषा से अभिव्यक्ति की सम्पूर्णता प्राप्त होती है और सामाजिक व आर्थिक परिवेश के साथ-साथ संस्कार और संस्कृति पर भी उसका दूरगामी प्रभाव पड़ता है. उथल-पुथल मचने वाला तथ्य यह भी है कि वर्तमान में सबसे ज्यादा गिरावट मातृभाषा की हुई है, तभी उसके परिणामस्वरूप हमारे संस्कार गिरे हैं, नैतिकता ह्रास हुई और संस्कृति को चोट पहुंची है. मातृभाषा और अपने देश की माटी से उत्पन्न भाषाओँ के मर्म को समझे बिना 'जनता की वाणी' नहीं समझी जा सकती. वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो ज्ञात होता है कि मन-मस्तिष्क में विचार की झलक सर्वप्रथम मातृभाषा से ही होती है. सुख-दुःख में आह भी अपनी ही भाषा में निकलती है. इन सब तथ्यों के बावजूद अंग्रेजी का वजूद कम होने की बजाय बढ़ा है. खलबली मचने के लिए ये काफी है कि हमारी पढ़ाई, न्याय, शासन और अर्थार्जन की भाषा 'अंग्रेजी' बना दे गयी तो देशभक्ति कमजोर हुई, हमारे शिक्षा प्राप्त करनेवाले नौनिहालों पर अपने भाषा की बजाय अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा. वातावरण का पश्चिमीकरण हुआ, भ्रष्टाचार बढ़ा, ईमानदारी तिरस्कृत हुई, नैतिकता की जड़े खोखली के गयी, लोकतंत्र पर 'अंग्रेजी मानसिकता' छाई और तो और अंग्रेजी भारी पड़ने से हमारे देश की भाषाएँ परायी हुई, ऐसे में हमारे पास क्या बच रहा है, यह बताना मुश्किल है. आज के वातावरण सच्चाई से रूबरू होते ये शब्द ललकारते हैं :
हिंदी या हमारी मातृभाषा दौड़ी वहां जहाँ जन-जन था,
फिर क्यों अंग्रेजी कर रही उसकी सिंह सवारी.
यहीं तो अपनों की आयाती अंग्रेजी का गम था,
तभी तो किस्ती वहां डूबी जहाँ पानी कम था.
हिंदी या हमारी मातृभाषा दौड़ी वहां जहाँ जन-जन था,
फिर क्यों अंग्रेजी कर रही उसकी सिंह सवारी.
यहीं तो अपनों की आयाती अंग्रेजी का गम था,
तभी तो किस्ती वहां डूबी जहाँ पानी कम था.
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